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अज्ञान को ढकने की कला

 

दिग्विजय राठौर किररिहा

 

विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटर थनबर्ग का कहना है कि इस उभरते अस्तित्व संकट के सबसे बुरे परिणामों से बचने का एकमात्र तरीका है तेजी से जागरूकता फैलाना क्योंकि आम जनता में अभी भी बहुत सी बुनियादी जानकारी नहीं है जो कि स्थिति को समझने के लिए आवश्यक है। परंतु हम भारतीय गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। हमें पता है कि धरती किस तरह से पर्यावरण की मार झेल रही है और इसके कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं हम भारतीयों को इसका समझ है, क्योंकि हम अज्ञान को ढकने की कला में माहिर है। अज्ञान को ढकने की कला तर्क दे सकती है, बहस कर सकती है, संस्कृत के श्लोक सुनकर शास्त्रार्थ कर हरा सकती है, जीत सकती है। जब भी आप जलवायु संकट के चलते मानव अस्तित्व पर आए संकट की बात करेंगे तो पहले जवाब मिलेगा नया क्या बता रहे हो सैकड़ों बार सृष्टि नष्ट हुई है एक बार फिर हो जाएगी।

 

कुछ कहते हैं हमारे ग्रंथो में पहले से ही लिखा हुआ है दुखम दुखम आरा आएगा। कुछ लोग तर्क देते हैं कि जो होगा सबके साथ होगा तब की तब देखेंगे। अधेड़ कहते हैं जब होगा तब तक तो हम नहीं रहेंगे। कुछ कहते हैं हमारे नेता हैं ना कुछ ना कुछ कर ही लेंगे। नेताओं को कुछ करना होता तो वह आपको सच बताते, जंगल नहीं कटवाते, वृक्षारोपण, इलेट्रिक व्हीकल और सोलर पैनल नाम की ग्रीनवॉशिंग नहीं करते। कुछ कहते हैं ऊपर वाला है कुछ ना कुछ तो करेगा ही। यह सब अज्ञान को ढकने की कला है। दलाई लामा कहते हैं जीसस, अल्लाह, बुद्ध जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। विश्वास मानिए दुनिया का कोई भी भगवान, मन्त्र, हवन या पूजा इस समस्या से निजात नहीं दिलवा सकता, हमने समस्या पैदा की है हमें ही सहना पड़ेगा | कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए आप स्वंय अपने को बदलने लगेंगे। इसलिए अज्ञान को ढकने की कला का सहारा ना लें।

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